भारतीय मरुस्थल (थार मरुस्थल): भूगोल, विशेषताएँ, वर्गीकरण और परीक्षा उपयोगी नोट्स
भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी छोर पर स्थित थार मरुस्थल (Thar Desert in Hindi) या भारतीय मरुस्थल (Indian Desert Geography) भूगोल का एक बेहद महत्वपूर्ण और परीक्षापयोगी विषय है। UGC NET Geography, RPSC 1st Grade, 2nd Grade, REET, UPSC और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं (State PCS) की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए इस टॉपिक से हर साल प्रश्न पूछे जाते हैं। यदि आप थार मरुस्थल का विस्तार (Thar Desert area and location), भारतीय मरुस्थल की विशेषताएँ, बरखान क्या है, और थार मरुस्थल की नदियाँ जैसे महत्वपूर्ण विषयों की तलाश में हैं, तो यह विस्तृत नोट्स आपके लिए अत्यंत उपयोगी साबित होंगे। मेसोजोइक युग में कभी समुद्र का हिस्सा रहा यह भू-भाग आज दुनिया का सबसे घना मरुस्थल है। आइए इस लेख में भारतीय मरुस्थल की भौगोलिक स्थिति, इसके वैज्ञानिक वर्गीकरण, जलवायु, और परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण सभी पहलुओं का संपूर्ण अध्ययन करें।
🎯 मुख्य बिंदु एक नज़र में (Quick Overview)
-
प्रमुख नाम: थार मरुस्थल / भारतीय मरुस्थल
-
भौगोलिक स्थिति: अरावली पहाड़ी के पश्चिमी किनारे पर शुष्क भू-भाग
-
कुल विस्तार: लगभग 2 लाख वर्ग किलोमीटर (भारत व पाकिस्तान में)
-
देशवार हिस्सा: भारत में 85% तथा पाकिस्तान में 15%
-
भारतीय राज्यों में विस्तार: राजस्थान (62%), गुजरात, पंजाब और हरियाणा
-
भौतिक आकार: लंबाई 640 किमी. और चौड़ाई 300 किमी.
-
प्रमुख नदी: लूनी नदी
-
जलवायु: उष्ण मरुस्थलीय (अत्यधिक वाष्पीकरण और 150 मिमी. से कम वर्षा)
-
उपयोगी परीक्षाएँ: UPSC, RPSC, REET, TGT, PGT एवं अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाएँ
1. भारतीय मरुस्थल का उद्गम और भौगोलिक पृष्ठभूमि
भारतीय मरुस्थल का इतिहास करोड़ों वर्ष पुराना है। यह क्षेत्र मेसोजोइक युग में समुद्र का हिस्सा हुआ करता था। भूगर्भिकीय दृष्टि से यह पूर्व कैंब्रियन युग की चट्टानों के साथ 2.5 अरब से 57 लाख वर्ष पुरानी अवसादी चट्टानों का परिवर्तित रूप है। इसकी रेत मुख्य रूप से नदियों द्वारा बहाकर लाए गए निक्षेपों और बालू के टिब्बों से ढका एक विस्तृत क्षेत्र है, जो बालु रेत के तरंगदैर्य मैदान के अंतर्गत आता है।
थार मरुस्थल का कुल विस्तार लगभग 2 लाख वर्ग किलोमीटर में है, जिसका 85 प्रतिशत हिस्सा भारत में और 15 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान में स्थित है। भारत के भीतर थार मरुस्थल का 62 प्रतिशत भाग अकेले राजस्थान में फैला हुआ है। भारतीय मरुस्थल का सर्वाधिक विस्तार मुख्य रूप से चार राज्यों—राजस्थान, गुजरात, पंजाब और हरियाणा में पाया जाता है। यह विश्व का 17वां सबसे बड़ा मरुस्थल होने के साथ-साथ दुनिया का सबसे घना मरुस्थल भी है।
2. जलवायु, नदियाँ और पर्यावरणीय विशेषताएँ
-
जलवायु और तापमान: यह एक उष्ण मरुस्थल है जहाँ की जलवायु अत्यंत शुष्क है। यहाँ गर्मियों में सामान्य तापमान 50°C तक पहुँच जाता है, जबकि सर्दियों में तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है। गर्मियों में यहाँ चलने वाली गर्म हवाओं को ‘लू’ कहा जाता है।
-
वर्षा और वाष्पीकरण: इस क्षेत्र में 150 मिलीमीटर से भी कम वर्षा होती है और अत्यधिक वाष्पीकरण की प्रक्रिया होती है।
-
अपवाह तंत्र (नदियाँ): इस क्षेत्र की सबसे बड़ी नदी ‘लूनी’ है। यहाँ नदियाँ अल्पकालिक होती हैं और अधिकांश नदियाँ वर्षा ऋतु के दौरान ही दिखाई देती हैं, जो मरुस्थल में ही लुप्त हो जाती हैं।
-
बालुका स्तूप और पवन अपरदन: वायु के कारण यहाँ रेत एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होती रहती है, जिससे विभिन्न आकृतियों के टीले बनते हैं। रेत से निर्मित होने वाले इन टीलों को ‘बालुका स्तूप’ कहा जाता है।
विशेष नोट – बरखान क्या है? बरखान अर्द्धचन्द्राकार बालुका स्तूप होते हैं। इनका पवनामुखी ढाल मंद व उत्तल तथा पवनाविमुखी ढाल तीव्र होता है। ये सामान्यतः 10 से 30 मीटर ऊँचाई तथा 100 से 200 मीटर चौड़ाई तक विस्तृत होते हैं। मरुस्थलीकरण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी बालुका स्तूप बरखान ही हैं।
3. थार मरुस्थल का वर्गीकरण
थार मरुस्थल को मुख्य रूप से दो आधारों पर वर्गीकृत किया गया है:
- वर्षा के आधार पर वर्गीकरण
- बालू एवं चट्टान के आधार पर वर्गीकरण
क. वर्षा के आधार पर वर्गीकरण
-
शुष्क क्षेत्र: जहाँ वार्षिक वर्षा 25 सेमी से कम होती है। इस क्षेत्र का क्षेत्रफल 1 लाख वर्ग किमी. है।
-
अर्द्धशुष्क क्षेत्र: जहाँ वार्षिक वर्षा 25 से 50 सेमी के मध्य होती है। इस क्षेत्र का क्षेत्रफल 75 हजार वर्ग किमी. है।
ख. बालू एवं चट्टान के आधार पर वर्गीकरण
-
इर्ग: जहाँ संपूर्ण रेतीला मरुस्थल पाया जाता है, उसे ‘इर्ग’ कहा जाता है।
-
हम्मादा: रेगिस्तान का वह उबड़-खाबड़ क्षेत्र जहाँ केवल चट्टानें पायी जाती हैं, ‘हम्मादा’ कहलाता है।
-
रेग: जहाँ रेतीला व चट्टानी दोनों प्रकार के क्षेत्र पाए जाते हैं, उसे ‘रेग’ कहा जाता है।
-
लघु मरुस्थल: यह अर्द्धशुष्क मरुस्थल वाला क्षेत्र है, जो कृषि कार्य के लिए उपयुक्त माना जाता है।
4. जनजीवन, वनस्पति और आर्थिक गतिविधियाँ
-
जनसंख्या और आवास: इस क्षेत्र में विषम जलवायु के कारण कम जनसंख्या निवास करती है। यहाँ की अधिकांश आबादी ग्रामीण इलाकों में और विषम घनत्व में फैली है। थार के मरुस्थल में जोधपुर जैसे प्रमुख और विकसित शहर भी स्थित हैं, जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग मिलजुलकर निवास करते हैं।
-
वनस्पति: यहाँ मिट्टी अनुपजाऊ होती है और वनस्पति बहुत कम पाई जाती है। मुख्यतः उष्णकटिबंधीय शुष्क झाड़ीदार वृक्ष, छोटी झाड़ियाँ और औषधीय जड़ी-बूटियाँ ही यहाँ पनपती हैं।
-
व्यवसाय और पशुपालन: यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन है। यहाँ गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और गधे पाले जाते हैं, तथा परिवहन और आजीविका के लिए मुख्य रूप से ऊँट पाले जाते हैं।
-
मरुस्थलीकरण की समस्या: थार के मरुस्थल का विस्तार अधिक बढ़ने के कारण वर्तमान में ‘मरूस्थलीकरण की समस्या’ एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बनती जा रही है।
💡 परीक्षार्थियों के लिए विशेष टिप्स (Exam Tips)
-
विश्व में स्थान: ध्यान रखें कि थार मरुस्थल विश्व का 17वां सबसे बड़ा मरुस्थल है, लेकिन जनसंख्या घनत्व के मामले में यह दुनिया का सबसे घना मरुस्थल है।
-
मुख्य नदी: इस मरुस्थल की प्रमुख नदी ‘लूनी’ है, जो अंततः कच्छ के रण में विलुप्त हो जाती है।
-
बरखान की विशेषता: परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि मरुस्थलीकरण के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी बालुका स्तूप कौन सा है? इसका सही उत्तर ‘बरखान’ (अर्द्धचन्द्राकार स्तूप) है।
-
भौगोलिक विस्तार: भारत में इसके कुल क्षेत्रफल का 62% हिस्सा अकेले राजस्थान राज्य में आता है।
निष्कर्ष
भारतीय मरुस्थल (थार मरुस्थल) केवल एक रेतीला और बंजर भू-भाग नहीं है, बल्कि यह अपनी समृद्ध संस्कृति, जैव-विविधता और संघर्षपूर्ण जीवनशैली का अनूठा प्रतीक है। भूगर्भीय इतिहास से लेकर वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों तक, यह क्षेत्र भूगोल के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए हमेशा से एक महत्वपूर्ण अध्ययन का केंद्र रहा है। मानवीय अनुकूलन और प्रशासनिक प्रयासों के जरिए इस मरुस्थलीय क्षेत्र में सतत विकास की संभावनाओं को लगातार तलाशा जा रहा है।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
ये भी पढ़ें :