प्रायद्वीपीय पठार (Peninsular Plateau in Hindi) भारतीय भू-भाग का सबसे प्राचीन और स्थिर भू-भाग है, जो अपनी भौगोलिक विविधता, खनिज संपदा और भूवैज्ञानिक संरचना के लिए प्रसिद्ध है। यदि आप प्रायद्वीपीय पठार की विशेषताएँ, प्रायद्वीपीय पठार का वर्गीकरण, मध्य उच्च भूमि (Central Highlands) तथा दक्कन का पठार (Deccan Plateau) को सरल भाषा में समझना चाहते हैं, तो यह मार्गदर्शिका आपके लिए उपयोगी है। UPSC, State PSC और SSC जैसी परीक्षाओं में इसके प्रमुख भाग, ढाल, नदियाँ और आर्थिक महत्व से प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। इस लेख में हम इसके निर्माण, विशेषताओं, घाटों, पठारों और जनगणना से जुड़े आंकड़ों को क्रम से समझेंगे।
📑 इस लेख में
भारत के भौतिक विभाग में प्रायद्वीपीय पठार मुख्य रूप से क्रिस्टलीय, आग्नेय और कायांतरित चट्टानों से निर्मित है। यह गंगा और यमुना के दक्षिण में स्थित विशाल भूखंड है। इसकी औसत ऊँचाई 600 से 900 मीटर के बीच है। पाठ्य-पुस्तकों के अनुसार इसका क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किमी है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग आधा है। इस क्षेत्र की अपवाह प्रणाली में नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी और ताप्ती नदियाँ शामिल हैं।
भारत का प्रायद्वीपीय पठार
प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन ‘गोंडवाना भूमि का भाग’ है। यह गोंडवाना भूमि के टूटने एवं अपवाह के कारण बना था। इसकी आकृति त्रिभुजाकार है, जिसका आधार उत्तर में और शीर्ष दक्षिण की ओर है। यह राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले से कन्याकुमारी (तमिलनाडु) तक तथा गुजरात से पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ है और बीच में टूटा हुआ है। इसका विस्तार दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, दक्षिणी बिहार, महाराष्ट्र, ओडिशा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल व तमिलनाडु में है।

प्रायद्वीपीय पठार की विशेषताएं | Features of Peninsular Plateau in Hindi
- यह पुराने क्रिस्टलीय, आग्नेय तथा रूपांतरित शैलों से बना है।
- यह भारत की सबसे बड़ी भौगोलिक इकाई है।
- यह भारत का सबसे प्राचीन भूखण्ड है।
- दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश का ढाल लहरदार है और इसकी दिशा सामान्यतः पश्चिम से पूर्व (उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व) की ओर है।

- इसकी औसत ऊँचाई 600-900 मी. है।
- प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वतमाला व दिल्ली, पूर्व में राजमहल पहाड़ियाँ, पश्चिम में गिर पहाड़ियाँ व दक्षिण में इलायची (कार्डामम) पहाड़ियाँ स्थित हैं।
- इसके उत्तर-पश्चिमी भाग (महाराष्ट्र और आसपास) का निर्माण ज्वालामुखी के लावा से हुआ है, जिसे ‘दक्कन ट्रैप’ कहते हैं। लावा के अपक्षय से यहाँ काली मृदा (रेगुर) बनी है। पूरे प्रायद्वीप पर काली मृदा नहीं मिलती।
प्रायद्वीपीय पठार का भौगोलिक विभाजन:
प्रायद्वीपीय पठार को दो भागों में विभाजित किया जाता है –
- मध्य उच्च भूमि (जिसमें मालवा का पठार शामिल है)
- दक्कन का पठार / दक्षिण का पठार

1. मालवा का पठार और मध्य उच्च भूमि
- नर्मदा नदी के उत्तर में प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग, जिस पर मालवा का पठार फैला है, मध्य उच्च भूमि कहलाता है।
- यह दक्कन पठार की उत्तरी सीमा पर स्थित है।
- इसके पूर्वी भाग में बुंदेलखण्ड और बघेलखण्ड हैं और इसका पूर्वी विस्तार राजमहल की पहाड़ियों एवं छोटा नागपुर पठार तक है।
- इसके उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वतमाला और दक्षिण में सतपुड़ा पर्वतमाला है।
- इस क्षेत्र में चंबल, सिंध, बेतवा तथा केन नदियाँ दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर बहती हैं।
- मध्य उच्च भूमि पश्चिम में चौड़ी है, लेकिन पूर्व में संकीर्ण है।
- इसकी औसत ऊँचाई 700-1000 मीटर है।
- इसका ढाल सामान्यतः उत्तर-पूर्व की ओर है।
- इसकी उत्तरी सीमा पर विंध्य पर्वतमाला, दक्षिणी सीमा पर सतपुड़ा और पश्चिमी सीमा पर अरावली है।

- मालवा का पठार सर्वाधिक ‘अवनलिका अपरदन’ से प्रभावित है और बेसाल्ट व ग्रेनाइट चट्टानों से बना है।
- मालवा पठार का निर्माण ज्वालामुखी लावा से हुआ है।
- यह अरावली तथा विंध्याचल के बीच स्थित है।
- यह मुख्यतः दक्षिण-पूर्वी राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में फैला है।
- इसके उत्तर में ‘बुन्देलखण्ड’ तथा उत्तर-पूर्व में ‘बघेलखण्ड का पठार’ है।
- सर्वाधिक अवनलिका अपरदन करने वाली प्रमुख नदी चंबल है। इसकी अपरदित भूमि को ‘उत्खात भूमि’ या ‘बीहड़’ कहते हैं।
- मालवा पठार पर काली मिट्टी पाई जाती है।
- मालवा पठार से चंबल, बेतवा और कालीसिंध नदियाँ निकलती हैं, जो उत्तर की ओर बहती हैं।
1. छोटा नागपुर का पठार
- छोटा नागपुर का पठार झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में फैला है।
- इसकी औसत ऊँचाई लगभग 700 मी. है और कुल क्षेत्रफल लगभग 65,000 वर्ग किमी है।
- करोड़ों वर्ष पूर्व भूगर्भीय क्रियाओं से यह पठार ऊपर उठकर गुम्बदाकार हो गया, जिस पर वर्तमान में झारखण्ड राज्य बसा है। इसी कारण यह खनिज-समृद्ध है।
- यह भारत का सर्वाधिक खनिज सम्पन्न क्षेत्र है, इसलिए इसे ‘भारत के खनिजों का अजायबघर’ कहा जाता है।

- छोटा नागपुर पठार से दामोदर और स्वर्णरेखा नदियाँ निकलती हैं।
- दामोदर नदी इस पठार को दो भागों में बाँटती है: उत्तरी भाग ‘हजारीबाग का पठार’ और दक्षिणी भाग ‘राँची का पठार’। यहाँ गोंडवाना युग का कोयला है, और दामोदर घाटी कोकिंग कोयले का देश का प्रमुख केंद्र है।
- इस पठार की सबसे ऊँची चोटी ‘पारसनाथ’ (लगभग 1,365 मी., झारखण्ड) है।
2. अरावली पर्वतमाला
- अरावली भारत की सबसे प्राचीन वलित पर्वतमालाओं में से एक है (परीक्षा-पुस्तकों में इसे विश्व की सबसे प्राचीन वलित श्रेणी भी लिखा जाता है)।
- यह एक अवशिष्ट पर्वत शृंखला है, यानी लंबे समय के अपक्षय से घिसकर नीची रह गई है।
- इसका निर्माण प्री-कैम्ब्रियन (धारवाड़) युग में हुआ। पुस्तकों में इसका काल लगभग 65 करोड़ वर्ष पूर्व बताया जाता है, जबकि विकिपीडिया के अनुसार इसकी चट्टानें लगभग 180–220 करोड़ वर्ष पुरानी हैं।
- इसकी लंबाई लगभग 670–692 किमी मानी जाती है।

- इसका विस्तार दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात में मिलता है।
- यह दिल्ली (रायसीना हिल्स) से लेकर गुजरात में पालनपुर/अहमदाबाद क्षेत्र तक फैली है।
- इसका सबसे ऊँचा शिखर ‘गुरु शिखर’ (1,722 मीटर) है, जो राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है।
- यह पर्वतमाला अरब सागर से आने वाले मानसून के समानांतर चलती है, इसलिए इसके पश्चिमी भाग में वर्षा कम होती है।
- यहाँ सीसा, जस्ता, चाँदी, ताँबा, रॉक फॉस्फेट आदि खनिज मिलते हैं।
3. विंध्याचल पर्वतमाला
- विंध्याचल पर्वत श्रेणी गुजरात से शुरू होकर मध्य प्रदेश, बघेलखण्ड और दक्षिणी उत्तर प्रदेश से होती हुई बिहार के कैमूर क्षेत्र (सासाराम) तक फैली है।
- यह ब्लॉक पर्वत शृंखला है और मालवा पठार के दक्षिण में है।
- इसकी लंबाई लगभग 1,200 किमी और अधिकांश भागों की ऊँचाई लगभग 300–700 मीटर है।
- इसका पूर्वी विस्तार ‘भांडेर व कैमूर’ पहाड़ियों के रूप में मिलता है।
- यह नर्मदा के उत्तर में उसके समानांतर पश्चिम से पूर्व तक फैली है और मुख्यतः बलुआ पत्थर व क्वार्टज़ाइट से बनी है।
- यह उत्तर भारत की नदियों और दक्षिण भारत की नदियों के बीच जलविभाजक का कार्य करती है।
- विंध्याचल की सबसे ऊँची चोटी ‘सद्भावना शिखर’ (गुडविल पीक/कालूमर) है, जो लगभग 752 मीटर ऊँची है और दमोह (मध्य प्रदेश) के पास स्थित है।
- विंध्याचल के दक्षिण में नर्मदा भ्रंश घाटी है और उसके दक्षिण में सतपुड़ा पर्वत है।
4. सतपुड़ा पर्वत
- यह पर्वतमाला नर्मदा व ताप्ती नदियों के बीच, विंध्याचल के दक्षिण में स्थित है और बेसाल्ट व ग्रेनाइट चट्टानों से बनी है।
- यह गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में फैली है।
- इसकी लंबाई लगभग 900 किमी है।
- दो भ्रंश घाटियों के बीच स्थित होने के कारण इसे ‘ब्लॉक पर्वत’ कहते हैं।

- सतपुड़ा पश्चिम से पूर्व की ओर तीन पहाड़ियों के रूप में विस्तृत है: राजपीपला, महादेव, मैकाल।
- इसका पूर्वी विस्तार ‘महादेव-मैकाल’ व ‘राजमहल पहाड़ियों’ के रूप में मिलता है।
- सतपुड़ा की सर्वोच्च चोटी ‘धूपगढ़’ (मध्य प्रदेश, लगभग 1,350 मीटर) महादेव पहाड़ी पर पचमढ़ी (हिल स्टेशन) में स्थित है। मैकाल श्रेणी का सर्वोच्च शिखर ‘अमरकंटक’ (लगभग 1,066 मीटर) नर्मदा व सोन नदी का उद्गम स्थल है।
- प्रायद्वीपीय भारत की सबसे ऊँची चोटी – अनाईमुड़ी (2,695 मी.)
- प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी – डोडाबेट्टा (2,637 मी.)
- भारत की सबसे दक्षिणतम पहाड़ी – कार्डेमम पहाड़ी
- पश्चिमी घाट की सबसे ऊँची चोटी – अनाईमुड़ी (2,695 मी.)
- पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी – परीक्षा-पुस्तकों में महेन्द्रगिरि (1,501 मी.), जबकि विकिपीडिया में अर्मा कोंडा (1,680 मी.)
2. दक्कन का पठार
- दक्कन के पठार को ‘दक्षिण का पठार’ भी कहा जाता है।
- नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित पठारी प्रदेश समग्र रूप से ‘दक्कन का पठार’ कहलाता है।
- यह सतपुड़ा पर्वत, पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट के बीच स्थित है।
- दक्षिण का पठार एक त्रिभुजाकार भूभाग है।
- इस पठार पर मेसोज़ोइक कल्प के क्रिटेशियस काल के अंत में ज्वालामुखी उद्गार से लावा फैला, जिसे ‘दक्कन ट्रैप’ कहते हैं। यह लावा 500,000 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र में फैला है।
- इसका मुख्य विस्तार महाराष्ट्र राज्य में है और इसमें गोदावरी एवं उसकी सहायक नदियाँ बहती हैं।

- यह पठार पश्चिम में ऊँचा एवं पूर्व की ओर कम ढाल वाला है।
- बेसाल्टिक लावा से निर्मित होने के कारण यहाँ काली मृदा है, जो नमी बनाए रखती है।
- इसके उत्तर में सतपुड़ा शृंखला और उत्तर-पूर्व में महादेव, कैमूर की पहाड़ी तथा मैकाल शृंखला स्थित है।
- इस पठार का एक भाग उत्तर-पूर्व में भी है, जिसे स्थानीय रूप से मेघालय पठार, कार्बी आंगलोंग पठार और उत्तरी कछार पहाड़ी कहा जाता है।
- मेघालय का यह भाग एक अंतराल (राजमहल-गारो गैप) द्वारा छोटा नागपुर पठार से अलग हो गया है।
- मेघालय पठार में पश्चिम से पूर्व की ओर तीन महत्त्वपूर्ण शृंखलाएँ – गारो, खासी तथा जयन्तिया हैं।
- दक्षिण के पठार के पूर्वी एवं पश्चिमी सिरे पर पूर्वी घाट एवं पश्चिमी घाट स्थित हैं।
1. पश्चिमी घाट
- पश्चिमी घाट उत्तर में ताप्ती नदी से दक्षिण में कन्याकुमारी तक लगभग 1,600 किलोमीटर की लंबाई में फैला है।
- यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी और प्रमुख पर्वत श्रेणी है।
- इसकी चौड़ाई लगभग 50 से 100 किमी तथा औसत ऊँचाई लगभग 900 से 1,600 मीटर (औसत लगभग 1,200 मीटर) है।
- पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट की अपेक्षा ऊँचे और क्रमबद्ध हैं।
- इनकी ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है।

- दक्षिणी भाग की चट्टानें प्राचीन हैं, जो ‘नीस’ (ग्रेनाइट), शिष्ट और ‘चार्नोकाइट’ प्रकृति की हैं।
- इसका पश्चिमी भाग कगारनुमा अर्थात् तीव्र ढाल वाला है।
- पश्चिमी तट की नदियाँ तीव्र वेग के कारण अरब सागर में गिरते समय ‘एश्चुअरी’ बनाती हैं।
- इसकी सबसे ऊँची चोटी ‘अनाईमुड़ी’ (2,695 मी.) है।
- पश्चिमी घाट को ‘सह्याद्रि’ भी कहते हैं।
पश्चिमी घाट का ढाल अरब सागर (पश्चिम) की ओर तीव्र और पूर्व की ओर मंद है। सह्याद्रि को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जाता है –
(A) उत्तरी सह्याद्रि – इसका विस्तार ताप्ती नदी से मलप्रभा नदी तक है। इस भाग का सर्वोच्च शिखर ‘कलसुबाई’ (महाराष्ट्र, 1,646 मीटर) है। गोदावरी नदी का उद्गम इसी क्षेत्र में नासिक के पास त्र्यंबकेश्वर (ब्रह्मगिरि) से होता है।
(B) मध्य सह्याद्रि – यह पर्वतमाला मलप्रभा नदी से ‘पालघाट दर्रे’ तक है। इसका एक प्रमुख शिखर ‘कुद्रेमुख’ (कर्नाटक, लगभग 1,892 मीटर) है। कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के कोडगु (तलकावेरी, ब्रह्मगिरि पहाड़ी) से होता है।
(C) दक्षिण सह्याद्रि – यह पर्वतमाला ‘पालघाट दर्रे’ से कन्याकुमारी तक है। इसका निर्माण मूल रूप से आर्कियन चट्टानों से हुआ है।
पश्चिमी घाट के प्रमुख दर्रे –
पश्चिमी घाट एक लगातार पर्वत श्रेणी है, जिसमें आवागमन के लिए चार प्रमुख दर्रे हैं –
(1) थाल घाट का दर्रा (महाराष्ट्र) – इस दर्रे से मुम्बई से नासिक जाने का रास्ता गुजरता है।
(2) भोर घाट का दर्रा (महाराष्ट्र) – इस दर्रे से मुम्बई से पुणे जाने का रास्ता गुजरता है।
(3) पाल घाट का दर्रा (केरल) – इससे कोच्चि (केरल) से कोयम्बटूर (तमिलनाडु) जाने का रास्ता गुजरता है। यह इस श्रेणी का सबसे चौड़ा दर्रा है।
(4) शेनकोट्टा का दर्रा (केरल-तमिलनाडु) – इस दर्रे से कोल्लम (केरल) से मदुरई/तेनकासी (तमिलनाडु) जाने का रास्ता गुजरता है।
2. पूर्वी घाट
- यह पर्वत श्रेणी प्रायद्वीपीय पठार के पूर्व में स्थित है। पाठ्य-पुस्तकों में इसका विस्तार महानदी घाटी से नीलगिरि की पहाड़ियों तक लगभग 1,300 किमी बताया जाता है (विकिपीडिया में लगभग 1,750 किमी)।
- इसकी चौड़ाई उत्तर में अधिक (लगभग 200 किमी) और दक्षिण में कम (लगभग 100 किमी) है। औसत ऊँचाई लगभग 600 मी. है।
- पश्चिमी घाट एवं पूर्वी घाट नीलगिरि की पहाड़ियों में मिलते हैं।
- पूर्वी घाट, पश्चिमी घाट की तुलना में कम ऊँचा एवं खण्डित है।

- पूर्वी घाट को महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियाँ काटती हैं और प्रायद्वीपीय पठार का ढाल पूर्व की ओर है, इसलिए अधिकांश बड़ी नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।
- परीक्षा-पुस्तकों में इसकी सबसे ऊँची चोटी महेन्द्रगिरि (ओडिशा, 1,501 मी.) लिखी जाती है। विकिपीडिया के अनुसार सबसे ऊँची चोटी अर्मा कोंडा (आंध्र प्रदेश, 1,680 मी.) है।
पूर्वी घाट में अनेक श्रेणियाँ पाई जाती हैं –
- नीलगिरि (तमिलनाडु)
- महेन्द्रगिरि (ओडिशा)
- पालकोण्डा व नल्लामलाई (आंध्र प्रदेश)
- जावदी (तमिलनाडु)
- मलकानगिरि (ओडिशा)
- शेवरॉय (तमिलनाडु)
नीलगिरी पहाड़ियाँ
- नीलगिरी पहाड़ियों का विस्तार तमिलनाडु, केरल व कर्नाटक में है।
- पश्चिमी घाट एवं पूर्वी घाट को जोड़ने वाली नीलगिरि की पहाड़ियाँ पश्चिमी घाट का ही भाग हैं।
- ये पहाड़ियाँ चाय के बागानों और चंदन के वनों के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ टोडा जनजाति निवास करती है।

- प्रसिद्ध पर्यटक स्थल ‘ऊटकमंडल (ऊटी)’ तमिलनाडु में नीलगिरी पहाड़ियों पर है।
- नीलगिरी की सबसे ऊँची चोटी ‘डोडाबेट्टा’ (2,637 मीटर) है, जो दक्षिण भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है।
- ये पहाड़ियाँ जैव विविधता और घने जंगलों के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा होती है।
- नीलगिरी पर ऊँचाई पर स्थित सदाबहार वनों को ‘शोला वन’ कहा जाता है।
- केरल का प्रसिद्ध सदाबहार वन ‘साइलेंट वैली’ भी नीलगिरी पहाड़ियों पर है।
भारत के प्रमुख पठार | Major plateaus of India in Hindi
- कर्नाटक या मैसूर का पठार
- दंडकारण्य पठार
- तेलंगाना का पठार
- मेघालय पठार / शिलांग पठार
- बुंदेलखण्ड का पठार
- बघेलखण्ड पठार
- लावा का पठार
- छत्तीसगढ़ निम्न भूमि पहाड़ियाँ
1. कर्नाटक या मैसूर का पठार
- यह प्राचीन पठार है और इसका विस्तार कर्नाटक राज्य में है।
- इसकी चट्टानें बहुत कठोर और प्राचीन (धारवाड़ क्रम की) हैं। औसत ऊँचाई लगभग 600–900 मीटर है।
- पश्चिमी पहाड़ी भाग ‘मलनाड’ और पूर्वी मैदानी भाग ‘मैदान’ कहलाता है।
2. दंडकारण्य पठार
- दंडकारण्य पठार का विस्तार ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तरी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पूर्वी महाराष्ट्र में है।
- यहाँ उबड़-खाबड़ पठार है।
- यह मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ और ओडिशा में है।
3. तेलंगाना का पठार
- इसका विस्तार तेलंगाना राज्य में है और यहाँ गोदावरी व कृष्णा प्रमुख नदियाँ हैं।
- यह दक्कन पठार का ही भाग है और अधिकांश क्षेत्र अर्द्धशुष्क है।
- इसके साथ ही ‘रायलसीमा का पठार’ आंध्र प्रदेश में स्थित है।
4. मेघालय का पठार
- इसे ‘शिलांग का पठार’ भी कहा जाता है।
- यह प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर-पूर्वी विस्तार है, जिस पर मेघालय राज्य बसा है।
- इसी के विस्तार को असम में ‘कार्बी आंगलोंग का पठार / उत्तरी कछार पहाड़ियाँ’ भी कहा जाता है।
- यह प्राचीन समय में प्रायद्वीपीय पठार से जुड़ा था, परंतु भ्रंशन और गंगा-ब्रह्मपुत्र के अवसादों से भरने के कारण बीच में अंतराल बन गया। इसे ‘राजमहल-गारो गैप / माल्दा गैप’ कहते हैं।

- इस अंतराल को गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों ने अपने जलोढ़ निक्षेपों से भर दिया है।
- शिलांग पठार की सबसे ऊँची चोटी ‘शिलांग पीक’ (लगभग 1,961 मी., खासी पहाड़ियाँ) है। गारो पहाड़ियों की सबसे ऊँची चोटी ‘नोकरेक’ (लगभग 1,412 मी.) है।
- यहाँ प्री-कैम्ब्रियन युग की प्राचीन चट्टानें पाई जाती हैं।
- पश्चिम में गारो पहाड़ियाँ, मध्य में खासी और पूर्व में जयन्तिया पहाड़ियाँ हैं।
5. लावा का पठार (दक्कन ट्रैप)
- यह लावा का पठार लगभग 5 लाख वर्ग किमी में मुख्यतः महाराष्ट्र, दक्षिण-पूर्वी गुजरात और मध्य प्रदेश व कर्नाटक के कुछ भागों में फैला है।
- इसका निर्माण क्रिटेशियस काल के अंत में ज्वालामुखी उद्भेदन से बेसाल्टिक लावा के जमने से हुआ।
- इससे बनी काली मिट्टी कपास की खेती के लिए उपयुक्त है।
6. बुंदेलखण्ड का पठार
- बुंदेलखण्ड का पठार उत्तर-प्रदेश व मध्य प्रदेश में फैला है।
- यह पठार ग्रेनाइट एवं नीस से बना है।
- यहाँ की जलवायु अर्द्धशुष्क है।

- यह लहरदार क्षेत्र है और कृषि के लिए अधिक उपयुक्त नहीं है।
- यह पठार यमुना की सहायक नदियों द्वारा अवनलिका अपरदन से बने बीहड़ और उत्खात स्थलाकृतियों के लिए चर्चित है।
7. छत्तीसगढ़ निम्न भूमि पहाड़ियाँ
- यह मुख्यतः ओडिशा के मध्य व पश्चिमी भाग में तथा छत्तीसगढ़ के दक्षिण में फैला है।
- इसका पश्चिमी निम्न भाग ‘छत्तीसगढ़ का मैदान’ तथा पूर्वी भाग ओडिशा में ‘गिरजात की पहाड़ियाँ’ कहलाता है।
- यहाँ की सबसे ऊँची चोटी ‘मलयगिरि’ (ओडिशा) है।
8. बघेलखण्ड पठार
- बघेलखण्ड पठार का विस्तार उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में है।
- यह पठार मैकाल श्रेणी के उत्तर में स्थित है।

- यह ग्रेनाइट, चूना पत्थर एवं बलुआ पत्थरों से बना है।
- सोन नदी का उद्गम अमरकंटक (मैकाल) के पास सोनमुड़ा से होता है।
दक्षिण भारत के प्रमुख पर्वत | Major mountains of South India
| नाम | अवस्थिति |
|---|---|
| नीलगिरी पर्वत | केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक |
| अन्नामलाई पर्वत | केरल, तमिलनाडु |
| कार्डामम पर्वत | केरल, तमिलनाडु |
| शेवरॉय पर्वत | तमिलनाडु |
| पालनी पर्वत | तमिलनाडु |
| जवादी पर्वत | तमिलनाडु |
| पालकोंडा पर्वत | आंध्र प्रदेश |
| नल्लामलाई पर्वत | आंध्र प्रदेश, तेलंगाना |
| वेलीकोंडा पर्वत | आंध्र प्रदेश |
जनसंख्या और जनगणना की दृष्टि से प्रायद्वीपीय पठार
प्रायद्वीपीय पठार खनिज-समृद्ध है, पर इसके अधिकांश भाग का जनसंख्या घनत्व गंगा के मैदान की तुलना में कम है। जनगणना 2011 में पठारी क्षेत्र के प्रमुख राज्यों का घनत्व इस प्रकार था (भारत का औसत 382):
| राज्य | जनसंख्या 2011 | घनत्व (व्यक्ति/वर्ग किमी) |
|---|---|---|
| झारखंड | 3.30 करोड़ | 414 |
| महाराष्ट्र | 11.24 करोड़ | 365 |
| कर्नाटक | 6.11 करोड़ | 319 |
| तेलंगाना | 3.50 करोड़ | 312 |
| ओडिशा | 4.20 करोड़ | 269 |
| मध्य प्रदेश | 7.26 करोड़ | 236 |
| राजस्थान | 6.85 करोड़ | 201 |
| छत्तीसगढ़ | 2.55 करोड़ | 189 |
| मेघालय | 29.7 लाख | 132 |
क्विज़: प्रायद्वीपीय पठार
प्रश्न 1. प्रायद्वीपीय भारत की सबसे ऊँची चोटी कौन-सी है?
- डोडाबेट्टा
- अनाईमुड़ी
- महेन्द्रगिरि
- धूपगढ़
✅ उत्तर देखें
प्रश्न 2. ‘भारत के खनिजों का अजायबघर’ किसे कहा जाता है?
- मालवा पठार
- छोटा नागपुर पठार
- मेघालय पठार
- बुंदेलखण्ड पठार
✅ उत्तर देखें
प्रश्न 3. पश्चिमी और पूर्वी घाट को कौन-सी पहाड़ियाँ जोड़ती हैं?
- नीलगिरि
- अरावली
- सतपुड़ा
- विंध्य
✅ उत्तर देखें
प्रश्न 4. दक्कन ट्रैप का निर्माण किस काल में हुआ?
- कैम्ब्रियन
- क्रिटेशियस के अंत में
- प्लीस्टोसीन
- मायोसीन
✅ उत्तर देखें
प्रश्न 5. जनगणना 2011 में प्रायद्वीपीय पठार के राज्यों में सबसे अधिक घनत्व किसका था?
- महाराष्ट्र
- झारखंड
- कर्नाटक
- छत्तीसगढ़
✅ उत्तर देखें
निष्कर्ष :
आज के आर्टिकल में हमने भारत का प्रायद्वीपीय पठार (Peninsular Plateau) के बारे में विस्तार से जानकारी दी। हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी दी गई जानकारी अच्छी लगी होगी। कोई त्रुटि दिखे या इस टॉपिक से जुड़ी कोई समस्या हो, तो हमें kkghorela@gmail.com पर लिखें। …धन्यवाद
FAQs –
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